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दिल्ली आबकारी नीति केस: सीबीआई ने बरी फैसले को हाईकोर्ट में दी चुनौती

दिल्ली की चर्चित आबकारी नीति मामले में नया कानूनी मोड़ आ गया है। सीबीआई ने 2021-22 की दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

सीबीआई ने अपनी 974 पन्नों की विस्तृत अपील में राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश जीतेंद्र सिंह के आदेश को ‘कानून के विपरीत’ बताते हुए गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं। एजेंसी का आरोप है कि आरोप तय करने के शुरुआती चरण में ही अदालत ने ‘मिनी ट्रायल’ जैसा रवैया अपनाया और अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों का विस्तृत विश्लेषण कर दिया, जबकि इस स्तर पर केवल प्रथम दृष्टया मामला देखना होता है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला 2021-22 की दिल्ली की नई आबकारी (शराब) नीति से जुड़ा है, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था। सीबीआई का आरोप है कि नीति तैयार करते समय जानबूझकर ऐसे बदलाव किए गए, जिनसे कुछ निजी कंपनियों को लाभ पहुंचे।

एजेंसी के मुताबिक:

  • थोक व्यापार को निजी हाथों में सौंपा गया।
  • मुनाफे का मार्जिन 5% से बढ़ाकर 12% किया गया।
  • टर्नओवर शर्तों में ढील दी गई।

सीबीआई का दावा है कि ये बदलाव सामान्य प्रशासनिक सुधार नहीं थे, बल्कि कथित ‘क्विड प्रो क्वो’ (लेन-देन) योजना का हिस्सा थे। एजेंसी का कहना है कि उसके पास वरिष्ठ नौकरशाहों के बयान और डिजिटल साक्ष्य हैं, जो नीति निर्माण में अनियमितताओं की ओर इशारा करते हैं।

ट्रायल कोर्ट ने क्या कहा था?

27 फरवरी को जारी आदेश में विशेष न्यायाधीश ने कहा था कि सीबीआई द्वारा पेश दस्तावेजों और साक्ष्यों से पहली नजर में भी ठोस मामला नहीं बनता। अदालत ने टिप्पणी की थी कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री किसी भी आरोपी के खिलाफ गंभीर संदेह तक उत्पन्न नहीं करती।

जज ने यह भी कहा था कि कथित बड़ी साजिश की थ्योरी उपलब्ध साक्ष्यों की कसौटी पर टिक नहीं पाती। इसी आधार पर सभी 23 आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया गया था।

सीबीआई की अपील में क्या दलील?

सीबीआई का कहना है कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन के पूरे मामले को समग्र रूप से देखने के बजाय उसे अलग-अलग हिस्सों में बांटकर परखा। एजेंसी के अनुसार, फैसले में कुछ अहम तथ्यों को नजरअंदाज किया गया और जांच एजेंसी के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियां ‘अनुचित’ हैं।

अपील में यह भी कहा गया है कि कथित अवैध धन का इस्तेमाल गोवा विधानसभा चुनाव में किया गया, हालांकि ट्रायल कोर्ट ने इसे अनुमान आधारित बताते हुए खारिज कर दिया था।

आगे क्या?

सीबीआई ने उसी दिन हाईकोर्ट का रुख किया, जिस दिन ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को राहत दी। दिल्ली हाईकोर्ट इस अपील पर 9 मार्च को सुनवाई करेगा।

यदि हाईकोर्ट को लगता है कि कानून की गलत व्याख्या हुई है या पर्याप्त आधार होने के बावजूद आरोप तय नहीं किए गए, तो मामला दोबारा ट्रायल के लिए भेजा जा सकता है। वहीं, यदि ट्रायल कोर्ट का फैसला सही माना जाता है, तो आरोपियों को मिली राहत बरकरार रहेगी।

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