दिल्ली बुक फेयर: “सर्वोहम् संवत्” का लोकार्पण; भारतीय कालबोध पर आधारित ग्रंथ ने राष्ट्रीय विमर्श को दी नई दिशा
नई दिल्ली | नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले (NDWBF) के मंच पर “सर्वोहम् संवत्” ग्रंथ का लोकार्पण केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा के पुनरुद्धार का एक बड़ा अवसर सिद्ध हुआ। यह कृति भारत की सनातन काल-चेतना और पारंपरिक समय-बोध पर आधारित एक गंभीर बौद्धिक विमर्श का केंद्र बनकर उभरी है।
प्रमुख अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति
कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठा प्रदान करते हुए अरुणाचल प्रदेश विधानसभा के माननीय अध्यक्ष आदरणीय तेसाम पोंगते जी (Hon’ble Speaker, Arunachal Pradesh Legislative Assembly) मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उनके साथ मंच पर विशिष्ट हस्तियों ने अपनी उपस्थिति से आयोजन को वैचारिक और सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ बनाया:
- आदरणीय बालमुकुंद पांडेय जी: सचिव, इतिहास संकलन योजना (जिनके मार्गदर्शन ने विमोचन को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य दिया)।
- आदरणीय कुलपति शर्मा जी: कुलपति, शिक्षा विभाग (शिक्षा जगत का प्रतिनिधित्व)।
- पूज्य स्वामी पुनर्वसन गिरी जी महाराज: आध्यात्मिक संरक्षण।
- श्री प्रशांत जैन जी: मैनेजिंग डायरेक्टर, किताबवाले समूह।
- आदरणीय अमित राय जैन जी: आध्यात्मिक-सांस्कृतिक मार्गदर्शन एवं कुशल मंच संचालन।
भारतीय कालगणना की वैज्ञानिकता पर ज़ोर
ग्रंथ की रचयिता प्रभा ललित सिंह ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि “सर्वोहम् संवत्” किसी नए संवत् की घोषणा नहीं है। बल्कि, यह ऋषि-प्रणीत भारतीय कालबोध की वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रामाणिकता को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत करने का एक शोधपरक प्रयास है।
उन्होंने बताया कि ग्रंथ की रचना के दौरान भारतीय और विदेशी काल-पद्धतियों का गहरा तुलनात्मक अध्ययन किया गया है, ताकि भारतीय संवत् प्रणाली की खगोलीय सटीकता (Astronomical Accuracy) और सांस्कृतिक निरंतरता को दुनिया के सामने रखा जा सके।
“जब समय को केवल यांत्रिक गणना तक सीमित कर दिया जाता है, तब समाज अपनी सांस्कृतिक दिशा खो देता है। ‘सर्वोहम् संवत्’ उसी दिशा-बोध की पुनः स्थापना का प्रयास है।” — प्रभा ललित सिंह, लेखिका
सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में एक पहल
विद्वानों का मानना है कि दिल्ली बुक फेयर से शुरू हुआ यह विमर्श साहित्य और इतिहास जगत में सकारात्मक चर्चा का विषय बन रहा है। इस ग्रंथ को भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण की दिशा में एक उल्लेखनीय पहल माना जा रहा है, जो आने वाली पीढ़ियों को भारत के गौरवशाली अतीत और उसकी वैज्ञानिकता से जोड़ने का कार्य करेगा।



