भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक और पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित एकनाथ वसंत चिटनिस का निधन

प्रख्यात भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक एकनाथ वसंत चिटनिस का पुणे स्थित उनके आवास पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 100 वर्ष के थे। भारत के अंतरिक्ष इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में जाने जाने वाले चिटनिस ने भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (आईएनसीओएसपीएआर) की स्थापना में अहम भूमिका निभाई, जो आगे चलकर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के रूप में विकसित हुई। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वे “हमारे अंतरिक्ष अभियान के प्रतीक पुरुषों में से एक” थे। रमेश ने 10 फरवरी 1962 की उस ऐतिहासिक मुलाकात को भी याद किया, जब विक्रम साराभाई और चिटनिस ने अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की थी — यह मुलाकात भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव रखने वाली साबित हुई।
श्री चिटनिस ने केरल के थुम्बा को भारत के पहले रॉकेट प्रक्षेपण स्थल के रूप में चुने जाने में निर्णायक भूमिका निभाई, जिसने देश की अंतरिक्ष यात्रा को गति प्रदान की। उन्होंने 1981 से 1985 तक अहमदाबाद स्थित इसरो के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (एसएसी) के निदेशक के रूप में कार्य करते हुए सुदूर संवेदन, उपग्रह संचार और भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली (आईएनएसएटी) जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं को आगे बढ़ाया। उनकी सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेंट (एसआईटीई) का नेतृत्व शामिल है, जो एक अभिनव पहल थी जिसने ग्रामीण भारत में शैक्षिक कार्यक्रमों के प्रसारण के लिए उपग्रह प्रौद्योगिकी का उपयोग किया। इस परियोजना ने यह दिखाया कि अंतरिक्ष तकनीक शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के क्षेत्र में परिवर्तन का माध्यम बन सकती है।
उनके परिवार में पुत्र चेतन चिटनिस, जो एक प्रसिद्ध आणविक जीवविज्ञानी और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हैं, पुत्रवधू और पोतियां हैं। एकनाथ वसंत चिटनिस का निधन न केवल भारत के अंतरिक्ष विज्ञान समुदाय के लिए अपूरणीय क्षति है, बल्कि यह देश के वैज्ञानिक इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के अंत का संकेत भी है। उनकी दूरदर्शिता और प्रेरणा भावी पीढ़ियों को अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छूने के लिए प्रेरित करती रहेंगी।



